अभिलाषा

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दूर देश से उड़ आया एक नन्हा पंछी
पार कर नदियां, पहाड़ और कितने बंधन
हो उन्मुक्त गगन में उड़ जाने की चाह लिये ।।

नन्हे कोमल पंखो तले साझे उसने कितने सपने
जेबे खाली, वृक्ष रहित, बस साथ एक अमानत लिए अपने ।
चाहा उसने, साथ सभी खरा विचारों के संबंध बढ़ाना
रह रह कभी अपने गांव, कभी गहरी नदी – ऊंचे पहाड़ों के किस्से सुनाना
कहना खुद को काफ़िर, क्या लाया साथ, आगे क्या ले जाना ?
संघर्ष, तपन, ऋतु प्रहार सब सह कर भी नही छोड़ा रण स्थल ।
ऊंची उड़ाने करने चली थी अब नन्हे पंखों को शिथिल ।
आस थी वापस अपने देश पहुंचकर स्थान सभी में पाऊंगा
छोटे वृद्ध सभी खगो को ये कथाएं कहा सुनाऊंगा ।

इस देश में सभी प्राणी रहते सक्षम, पर संकीर्ण विकल
उम्दा तालीमें लेने पर भी ना पाई उनकी सोच बदल ।
आये थे मेरे जैसे ही, ले नन्हे पंख – सपने भव्य
जीवन के थपेड़ों में, न जाने क्यो, हो गया उनका अस्तित्व द्रव्य ।
कुछ तो आये मुझ से भी बड़े कुटुम्बों से कुलीन
फिर भी क्यों किया इस देस ने उनको खुद में विलीन ।
दर्शाते हैं, न जाने पार करेंगे कितने अम्बर
पर अपनों से ही स्नेह का करने लगे है क्यों आड्म्बर ?
गैर महफूज़ खुद को अपनों के बीच हैं क्यों पाते ?
गर प्यार बांटनें आये कोई, वो उसे भी नही अपनाते ।

सुलझाना चाहूं ये पहेली, लगे मुझे जो बड़ी अजब,
कब-तलक अस्तित्व के आगे तालीमें और क्षण-भंगुरता होंगे बे-अदब
आखिर कब तक उस प्यार बांटने आये उस नन्हे पंछी को सब करेंगे मुखातिब ?
नकाबों की इस नगरी में क्या साथ भी नही होता मुनासिब ?
क्या गलती इतनी है कि क्यों वो पछी ना ढाल सका अपनी रूह पर वो जामा ?
शहर की चका चैंध क्यों न कर पायी ना गद्धम उसके ख्वाबों का शामियाना
या फिर ख़ता ये है कि आखिर अब तक वह कैसे बच पाया ?
क्यों ये शहर निगल न सका उसके अस्तित्व की काया ?

थक हार कर जब जब बैठा वह पंछी कई शाम
टटोल कर अपने नग्में, यादें, घर वालों के पैगाम ।
आमिल हो कि से देस ना दे सका उसको कुछ दोस्त
पर इस पाक-अस्तित्व की हिफाज़त में बनेगा वो फिर खानाबदोश ।
फिर नया देस, नये कस्बे, कर ऊंचे पहाड़-नदी-नाले पार
कुछ सीख लिये, रख महफूज़ इख्लाक, एक ऊंची उड़ान फिर से, नही मानेगा हार ।
गर किसी मोड़ पर वो खट्टे नग्में हो पड़े मुदस्सर
बिन माथे पर दिए शिकन, जीवन को पुनः देगा अवसर ।।

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