🏡 वही अपना इलाहाबाद

Written by Ozair Siddiqui, narrated by Mohammad Faraz.

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अकबर ने बनाया था राजधानी कभी जिसको, 

उस पुराने अल्लाह-आबाद की बात ही अलग है। 

राजा बादशाहों के क़िले और भी यूँ तो बहुत हैं, 

संगम पे अकबर के क़िले की बात ही अलग है। 

यूँ तो गंगा भी है यमुना भी है कई जगह बहती, 

मिलती है यहाँ इस संगम की बात ही अलग है। 

बहुत हैं लाल यहाँ और जवाहर भी बहुत हैं, 

आनंद भवन के जवाहर की बात ही अलग है। 

वह राज़ हों हरिवंश हों या अकबर इलाहाबादी, 

यहाँ के उन अज़ीम शायरों की बात ही अलग है। 

परदे पर दिखते हर शहर के अदाकार बहुत हैं, 

अपने शहर के अमिताभ की बात ही अलग है। 

शेरशाह की तखलीक़ भी  गुज़री है यहाँ से, 

इस मशहूर जी टी रोड की बात ही अलग है। 

मुग़ल औरंगज़ेब ने भी था कभी डेरा यहाँ डाला, 

कुम्भ को ज़मीन वक्फ़ की वह बात ही अलग है। 

ज़माने से कही जाती पूरब की आक्सफोर्ड, 

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की बात ही अलग है। 

मिलने को तो मिल जाते हैं यह हर जगह लेकिन, 

इलाहाबाद के इन अमरूदों की बात ही अलग है। 

तफरीह के लिए यूँ तो सारा शहर ही पड़ा है, 

अल्फर्ड पार्क खुसरू बाग़ की बात ही अलग है। 

वैसे तो हो गया है अब प्रयागराज नाम इसका, 

फिर भी अपने इस शहर की बात ही अलग है। 

वैसे तो करते हैं और भी बहुत इस शहर के चर्चे, 

उज़ैर ने जो कहे उन शेरों की बात ही अलग है। 
                       ✍ Ozair

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